चाँद..

 आसमान के दो राही.

एक पूरब में.. एक पश्चिम में.

एक के हिस्से सबेरा.

एक के हिस्से रात आई.

दिनकर था ताकतवर सा.

सो जीतकर अभिमान से सुलगता ही रहा.

पर चाँद की सुंदरता ,शीतलता....

आह वाह में उलझती रही.

उपमाओं के फेर में पूरनमासी की चाँदनी.

नित चेहरों की तुलना के भँवर में.

अपनी सुंदरता बिखेरती रही.

कभी ग्रसित हुई राहु से.

कभी केतु के आगोश रही.

कभी सुंदरी का सोलह श्रृंगार.

कभी काली अमावस रात बनी.

कभी प्रेमी के सन्तप्त हृदय को दग्धित करती.

कभी पथिक की राह बनी.

सूरज को मिला सम्मान सदा.

चाँद ने मान.. अपमान दोनों का घूँट भरा.

शिष्टाचार रहा ऐसा मुफ़्त ही बदनाम हुआ.

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