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Showing posts from October, 2020

चाँद..

 आसमान के दो राही. एक पूरब में.. एक पश्चिम में. एक के हिस्से सबेरा. एक के हिस्से रात आई. दिनकर था ताकतवर सा. सो जीतकर अभिमान से सुलगता ही रहा. पर चाँद की सुंदरता ,शीतलता.... आह वाह में उलझती रही. उपमाओं के फेर में पूरनमासी की चाँदनी. नित चेहरों की तुलना के भँवर में. अपनी सुंदरता बिखेरती रही. कभी ग्रसित हुई राहु से. कभी केतु के आगोश रही. कभी सुंदरी का सोलह श्रृंगार. कभी काली अमावस रात बनी. कभी प्रेमी के सन्तप्त हृदय को दग्धित करती. कभी पथिक की राह बनी. सूरज को मिला सम्मान सदा. चाँद ने मान.. अपमान दोनों का घूँट भरा. शिष्टाचार रहा ऐसा मुफ़्त ही बदनाम हुआ.

अभिशाप..

 काँप उठी रूह..  बस अब बस.. लगता है... द्वापर से कलयुग तक.. दुर्योधन.. दुःशासन आज भी जिंदा हैं. भीष्म पितामह का मौन.. धृतराष्ट्र का अन्धापन.. पाँच पाँच पतियों का मौन.. ओह. द्वापर का वह अभिशाप.. कितनी द्रौपदियों के शील का हरण करेगा. कितनों की मौत का कारण बनेगा.  ओरत की आत्मा को छीलता. यह दंश. कितनी पद्मिनियों के जौहर का कारण बनेगा. क्या कभी कोई कृष्ण आकर..  विषदंश की जलन को दूर करेगा. क्या पापियों के नाश के लिए. भवानी आएंगी. या फिर  इस युग का महाभारत का इतिहास रचा जाएगा..                                                                                        मेरी कलम से..GD