गूँजती सिसकियाँ.
कैसे सो रहा होगा.. ख़ुदा...हृदय भेदी क्रंदन सुनकर. हृदय उसका दहलता होगा जरूर..फिर भी मौन है सब देखकर.. मौत का यह ख़ौफ़नाक मंज़र. या इलाही माजरा क्या है. तेरे दर पर. भीड़ इतनी.क्या तुझे कुछ पता नहीं है. कहीं गिर रही है चीख कर कोई माँ अपने आँगन में. मेरा प्यारा लाल कहाँ है.. आखिर उसे हुआ क्या है. कहीं तोड़ रहीं हैं कलाइयों में पहनी चूड़ियाँ..ओरतें.. बिलख रहीं हैं कहते हुए.. मेरा प्रियतम कहाँ है. बचपन से गुजरते बच्चे नहीं समझ पा रहे कुछ भी. किसी की माँ नहीं दिखती..किसी को पिता का पता नहीं है. जमा पूँजी गवाँई. फिर भी जान के पड़ गए लाले. बिके जेवर. बिकी जमीं. बिके आशियाने.. चार कँधे नहीं मिले गैर हमसफर बने आखिरी सफ़र के. जिंदगी बिता दी सुखोपभोग में यह सोचा ही न था. लकडियाँ तक न मयस्सर होंगी..बेजान इस रूह को.. विचलित हो रहा है मन..यह खता किसकी है. खता गर मानव की है तो ईश्वर की इतनी कड़ी सजा क्यों है.