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गूँजती सिसकियाँ.

 कैसे सो रहा होगा.. ख़ुदा...हृदय भेदी क्रंदन सुनकर. हृदय उसका दहलता होगा जरूर..फिर भी मौन है सब देखकर.. मौत का यह ख़ौफ़नाक मंज़र. या इलाही माजरा क्या है. तेरे दर पर. भीड़ इतनी.क्या तुझे  कुछ पता नहीं है. कहीं गिर रही है चीख कर कोई माँ अपने आँगन में. मेरा प्यारा लाल कहाँ है.. आखिर उसे हुआ क्या है. कहीं तोड़ रहीं हैं कलाइयों में पहनी चूड़ियाँ..ओरतें.. बिलख रहीं हैं कहते हुए.. मेरा प्रियतम कहाँ है. बचपन से गुजरते बच्चे नहीं समझ पा रहे कुछ भी. किसी की माँ नहीं दिखती..किसी को पिता का पता नहीं है. जमा पूँजी गवाँई. फिर भी जान के पड़ गए लाले. बिके जेवर. बिकी जमीं. बिके आशियाने.. चार कँधे नहीं मिले गैर हमसफर बने आखिरी सफ़र के. जिंदगी बिता दी सुखोपभोग में यह सोचा ही न था. लकडियाँ तक न मयस्सर होंगी..बेजान इस रूह को.. विचलित हो रहा है मन..यह खता किसकी है. खता गर मानव की है तो ईश्वर की इतनी कड़ी सजा क्यों है.

रेगिस्तान..

 कैसे बन जाते हैं रेगिस्तान. क्या कहानी है इन मरुस्थलों की. कभी यहाँ भी नदियों की कलकल नाद गूँजती होगी कभी तो कोई दरख़्त यहाँ भी. फलाफूला होगा. अब तो सब बीता हुआ कल हो गया है  शेष रह गई है मौन दास्तां  ये तो एहसास की बातें हैं. अनकहे जज्बात की कतारें हैं. यह तो प्रमाण है कि उपेक्षा और तिरस्कार सहते सहते सूख गया होगा अथाह प्रेम का दरिया. किसी प्रेमी के इंतजार में अवनि निष्ठुर हो गई होगी. तभी चट्टान की तरह सख्त और शुष्क बन गई होगी. सच है प्रेमी का विछोह कैसे सहती. इसलिए धरा मरुस्थल बन गई होगी.

चाँद..

 आसमान के दो राही. एक पूरब में.. एक पश्चिम में. एक के हिस्से सबेरा. एक के हिस्से रात आई. दिनकर था ताकतवर सा. सो जीतकर अभिमान से सुलगता ही रहा. पर चाँद की सुंदरता ,शीतलता.... आह वाह में उलझती रही. उपमाओं के फेर में पूरनमासी की चाँदनी. नित चेहरों की तुलना के भँवर में. अपनी सुंदरता बिखेरती रही. कभी ग्रसित हुई राहु से. कभी केतु के आगोश रही. कभी सुंदरी का सोलह श्रृंगार. कभी काली अमावस रात बनी. कभी प्रेमी के सन्तप्त हृदय को दग्धित करती. कभी पथिक की राह बनी. सूरज को मिला सम्मान सदा. चाँद ने मान.. अपमान दोनों का घूँट भरा. शिष्टाचार रहा ऐसा मुफ़्त ही बदनाम हुआ.

अभिशाप..

 काँप उठी रूह..  बस अब बस.. लगता है... द्वापर से कलयुग तक.. दुर्योधन.. दुःशासन आज भी जिंदा हैं. भीष्म पितामह का मौन.. धृतराष्ट्र का अन्धापन.. पाँच पाँच पतियों का मौन.. ओह. द्वापर का वह अभिशाप.. कितनी द्रौपदियों के शील का हरण करेगा. कितनों की मौत का कारण बनेगा.  ओरत की आत्मा को छीलता. यह दंश. कितनी पद्मिनियों के जौहर का कारण बनेगा. क्या कभी कोई कृष्ण आकर..  विषदंश की जलन को दूर करेगा. क्या पापियों के नाश के लिए. भवानी आएंगी. या फिर  इस युग का महाभारत का इतिहास रचा जाएगा..                                                                                        मेरी कलम से..GD
 एक बार नहीं फुर्सत में कई बार.. खोद कर देख लिया दिमाग का कब्रगाह.. हर बार दबा दी गईख्वाहिशों की..  सिसकियों ने मजबूर कर दिया कि.. अब फ़िर न नज़र डाली जाए.. फ़िर न खोदने की ज़हमत उठाई जाए..                                                                       मेरी ✏️कलम से....

तलाश..

 वक़्त की तेज़ रफ़्तार. के साथ आहिस्ता आहिस्ता, बढ़ती हुई बहुत आगे तक.. पहुँच गई जिंदगी.. झटक देती हूँ कुछ सवालों को. फ़िर भी जेहन में.. एक गूँज सुनाई देती है. अंतिम क्षण तक ख़ोज. जारी रहेगी क्या ? क्यों नहीं मिला.. आज तक??? यथार्थ के धरातल पर कोई. जो विचारों के झंझावात को. मन के भीतर डूबते उतराते. जज्बातों को. अनछुए पहलुओं को. ख़यालों की बुनियाद को. घुमड़ते तूफ़ानो को. साँसों की उच्छ्वासों को. मेरे अनसुलझे रहस्यों को छूकर मुझे समझने की ज़हमत..  उठा पाने में समर्थ होता.

भय

लोग हैरान परेशां से घूम रहे हैं.क्यों  अनजाने भय से चेहरे पीले हो रहे हैं क्यों.. चाहने न चाहने से कुछ होने वाला नहीं है. तक़दीर का लिखा टलने वाला नहीं है.. जिंदगी में रोज सुबह तो होती है. पर मौत की एक ही तारीख नियत होती है..